सोसाइटी पर सन्नाटा, खाद के लिए भटकते किसान; खाद आते ही ट्रॉली भरकर ले जाने का खेल और महंगे दामों पर बिक्री ने खड़े किए गंभीर सवाल
दातागंज । खेत में फसल उगाने की तैयारी किसान करे, खाद के लिए चक्कर किसान काटे और जब डीएपी मिलने की बारी आए तो उसके हाथ खाली रह जाएं! दातागंज क्षेत्र के आजमपुर सोसाइटी पर डीएपी खाद की किल्लत के बीच कुछ ऐसे ही हालात सामने आ रहे हैं। सरकारी सोसाइटी पर किसानों को खाद नहीं मिल रही, सोसाइटी की गतिविधियां लगभग ठप नजर आती हैं और दूसरी ओर निजी बाजार में डीएपी का एक बोरा 1650 से 1800 रुपये तक में मिलने की शिकायत है। आखिर यह कैसा खाद प्रबंधन है, जिसमें जरूरतमंद किसान परेशान है और महंगे बाजार में खाद उपलब्ध बताई जा रही है?
खाद की खेप आते ही कुछ लोगों द्वारा ट्रॉली भरकर खाद ले जाने की चर्चा है, जबकि छोटे और जरूरतमंद किसान खाद के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि खाद का वितरण किस आधार पर हो रहा है? क्या वास्तविक जरूरत वाले किसानों तक खाद पहुंच रही है या वितरण व्यवस्था में कहीं ऐसी खामी है, जिसका खामियाजा आम किसान भुगत रहा है?
खाद के लिए इस सोसाइटी पर पहुंचने वाले किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। लगभग ये सोसाइटी बंद ही रहती है जब फोन द्वारा सचिव से खाद की उपलब्धता पूछने पर कथित तौर पर यह जवाब मिलने की बात सामने आती है कि “कहीं और से जुगाड़ कर लो, यहां का कोई भरोसा नहीं है।” यदि सरकारी सोसाइटी से ही किसान को खाद मिलने की उम्मीद नहीं बचेगी, तो सरकारी व्यवस्था का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
यह मामला केवल खाद की कमी का नहीं, बल्कि किसान की मजबूरी और वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता का है। बुवाई के समय खाद न मिलने का मतलब किसान के सामने अतिरिक्त खर्च, समय की बर्बादी और फसल की तैयारी को लेकर चिंता बढ़ना है।
किसान को भाषण नहीं, समय पर खाद चाहिए। यदि सरकारी व्यवस्था में खाद उपलब्ध है, तो वह जरूरतमंद किसान तक क्यों नहीं पहुंच रही? और यदि खाद उपलब्ध नहीं है, तो निजी बाजार में उसकी उपलब्धता और कीमत की जांच कौन करेगा? इन सवालों का जवाब अब किसानों को चाहिए।

















